Thursday, October 20, 2011

बरसों का बिछड़ा प्यार ...



बरसों का बिछड़ा प्यार...

बेजान पड़ी सुखी टहनी भी
हरी भरी हो जाती है,
बारिश की पहली बूँद का
पुरजोर असर होता है |
बरसों का बिछडा प्यार मिले
तो यार गजब होता है |


ओस की वो बूँद, कोहरे की वो धुंध;
सब नया नया लगता है |
वही पुराना चाँद फिर आँखों में जँचता है |
बरसों का बिछड़ा प्यार मिले
तो यार गजब लगता है |


बारिश की वो बूँद फिर मोती से
लगने लगते हैं ...
वीराने सीने में फिर
अरमान सुलगने लगते हैं |
आँखों में सारी रात
करवटों में दिन होता है |
बरसों का बिछड़ा प्यार मिले
तो यार गजब लगता है |


शहनाई बजने लगती है,
फिर समां पिघलने लगता है |
हार रात दिवाली लगती है,
हर दिन आँखों में सजता है |
बरसों का बिछड़ा प्यार मिले
तो यार गजब ही लगता है |

Monday, October 3, 2011

आदमी...


आदमी...

दुनिया मैं बादशा है, सो है वो भी आदमी
और मुफलिस ओ गदा है, सो है वो भी आदमी
ज़रदार बे नवा है, सो है वो भी आदमी
नेमत जो खा रहा है, सो है वो भी आदमी
टुकड़े जो मांगता है, सो है वो भी आदमी

अब्दाल ओ कुतब ओ गौस ओ वली, आदमी हुए
मुन्कर भी आदमी हुए, और कुफ्र से भरे
क्या क्या करिश्मे कश्फ़ ओ करामत के किये
हत्ता के अपने ज़हद ओ रियाज़त के जोर से
खालिक से जा मिला है, सो है वो भी आदमी

फ़रऊन  ने किया था जो दावा खुदाई का
शद्दाद भी बहिश्त बना कर हुआ खुदा
नमरूद भी खुदा ही कहाता था बरमला
ये बात है समझने की आगे कहूं मैं क्या
यां तक जो हो चुका है, सो है वो भी आदमी

याँ आदमी ही नार है, और आदमी ही नूर
याँ आदमी ही पास है, और आदमी ही दूर
कुल आदमी का हुस्न ओ क़बह में है याँ ज़हूर
शैतान भी आदमी है, जो करता है मकर ओ जूर
और हादी, रहनुमा है सो है वोह भी आदमी

मस्जिद भी आदमी ने याँ बनायी है मियाँ
बनते हैं आदमी ही इमाम और ख़ुत्बा खां
पढ़ते हैं आदमी ही कुरान और नमाज़ याँ
और आदमी ही उन की चुराते हैं जूतियाँ
जो उनको ताड़ता है, सो है वो भी आदमी

याँ आदमी पे जान को वारे है आदमी
और आदमी ही तेग़ से मारे है आदमी
पगड़ी भी आदमी की उतारे है आदमी
चिल्ला के आदमी को पुकारे है आदमी
और सुन के दौड़ता है, सो है वो भी आदमी

चलता है आदमी ही मुसाफिर हो, ले के माल
और आदमी ही मारे है, फांसी गले में डाल
याँ आदमी ही सैद है और आदमी ही जाल
सच्चा ही आदमी ही निकलता है मेरे लाल
और झूट का भरा है, सो है वो भी आदमी

याँ आदमी नकीब हो, बोले है बार-बार
और आदमी ही प्यादे हैं, और आदमी सवार
हुक्का, सुराही, जूतियाँ दौड़ें बगल में मार
काँधे पे रख के पालकी, हैं आदमी कहार
और उस पे जो चढ़ा है, सो है वो भी आदमी

बैठें हैं आदमी ही दुकानें लगा लगा
कहता है कोई, लो, कोई कहता है, ला रे ला
और आदमी ही फिरतें हैं रख सर पे खौन्चा
किस किस तरह से बेचे हैं चीज़ें बना बना
और मोल ले रहा है, सो है वो भी आदमी

तबले, मंजीरे, दायरे, सारंगियां बजा
गाते हैं आदमी ही हर इक तरह जा ब जा
रंडी भी आदमी ही नचाते हैं गत लगा
वो आदमी ही नाचे हैं और देखो ये मज़ा
जो नाच देखता है, सो है वो भी आदमी

याँ आदमी ही लाल, जवाहर है बेबहा
और आदमी ही खाक से बदतर है हो गया
काला भी आदमी है के उल्टा है जों तवा
गोरा भी आदमी है के टुकड़ा सा चाँद का
बद-शक्ल ओ बद-नुमा है, सो है वो भी आदमी

इक आदमी हैं जिन के ये कुछ जौक-ओ-बर्क हैं
रूपे के उन के पाँव हैं, सोने के फ़र्क़ हैं
झुमका तमाम गर्ब से ले ताबा शर्क़ हैं
कमख्वाब, ताश, शाल-ओ-दोशालों में ग़र्क़ हैं
और चीथड़ों लगा है, सो है वो भी आदमी

इक ऐसे हैं के जिन के बिछे हैं नए पलंग
फूलों की सेज उन पे झमकती है ताज़ा रंग
सोते हैं लिपटे माशूक-ए-शोख-ओ-संग
सौ सौ तरह से एश के करते हैं रंग-ओ-ढंग
और ख़ाक में पड़ा है, सो है वो भी आदमी

हैराँ हूँ, यारो, देखो तो ये क्या स्वांग है
आप आदमी ही चोर है, और आप ही थांग है
है छीना झपटी, और कहीं मांग तांग है
देखा तो आदमी ही यहाँ मिस्ल-ए-रांग है
फौलाद से कड़ा है, सो है वो भी आदमी

मरने में आदमी ही कफ़न करते हैं तैयार
नहला धुला उठाते हैं काँधे पे कर सवार
कलमा भी पढ़ते जाते हैं, रोते हैं जार जार
सब आदमी ही करते हैं, मुर्दे का कारोबार
और वो जो मर गया है, सो है वो भी आदमी

अशराफ और कमीने से ले, शाह ता वजीर
हैं आदमी ही साहब-ए-इज्ज़त और हक़ीर
याँ आदमी मुरीद हैं, और आदमी ही पीर
अच्छा भी आदमी ही कहाता है ए 'नजीर'
और सब में जो बुरा है, सो है वो भी आदमी

- नज़ीर अकबराबादी