Wednesday, September 14, 2011

हिंदी की कहानी हिंदी की जुबानी


हिंदी की कहानी हिंदी की जुबानी



सर्वश्व हम लुटा चुके,पुकारता ये छंद है,
की ६४ बसंत खर्चकर भी मुंह क्यों बंद है ?

माना निकम्मी सरकार कम्बख्क्त कर्जखोर है,

हिंद की भाषा का क्या बस यही मोल है ??

या हिंद के बेटों का अब वो खून न है खौलता,

जिसको देखे मात्र से वनराज भी था बोलता |

हिंदी का सम्मान गर लौटाओ तो कुछ बात हो,

खैच लो जिह्वा सभी की जो न मेरे साथ हो |

वर्षों सहे अपमान अपने ही वतन की गोद में,

और कितने साल झोंके जायेंगें फिर शोध में |

रंच मात्र भी किसी को दुःख नहीं अपमान का,

पता नहीं कितने बरस मैं और जिंदा रह पाऊँ |

अपने ही मुल्क में और कितनी बेईज्ज़ती पाऊँ,

ए देश के कर्णधार में और कहाँ जाऊँ ??
   

Wednesday, July 20, 2011

संहार...

संहार...
 
हृदय करे चीत्कार,प्रभु अब शुरू करो संहार,

बहुत हो चुका इक्का-दुक्का हो अब धुवांधार |

सांप सपोले बहुत हो गए जगह नहीं अब शेष,

दूध पिलायें इनको कितना बहुत खा चुके ठेस |

जिसको अपना समझ के पाला हाय रे मेरे देश,

लज्जित करके तुमको दिखाया अपना पापी भेष |

इनको जब तक माफ करोगे,सब सहेगें अत्याचार,  

हृदय करे चीत्कार,प्रभु अब शुरू करो संहार,

बहुत हो चुका इक्का-दुक्का हो अब धुवांधार |

बरसों बीते देख के इनके नाटक वो जज्बाती,

परोपकार का ओढ़ के चोला ऐसा रंग जमाती |

रंग बदलना इनका देख कर गिरगिट भी शर्माती,

लुटा देश को इसने इतना जिह्वा बोल न पाती |

कब तक यूँ हम सहते रहेंगें इनका घोर प्रहार,

हृदय करे चीत्कार,प्रभु अब शुरू करो संहार,

बहुत हो चुका इक्का-दुक्का हो अब धुवांधार |

धरती बदली अम्बर बदला बदली सूरत और सीरत,

एक चीज़ जो अडिग अटल है इनकी कपटी नीयत |

देश को हर जगह से इसने नोच-नोच कर लूटा,

देश-प्रेम कर्त्तव्य से इनका बरसों से नाता छुटा |

अति हो चुकी प्रभु अब ले हाथ उठो तलवार,

हृदय करे चीत्कार,प्रभु अब शुरू करो संहार,

बहुत हो चुका इक्का-दुक्का हो अब धुवांधार |



      



Friday, July 15, 2011

यह आग कब बुझेगी...

यह आग कब बुझेगी...

थकती आँखों ने मेरी वो सारा मंजर देखा है,

इसी बदन ने मेरे वो सारा तड़पन झेला है,

कुछ गोली थी बंदूकों की चुभने वाले खंजर भी थे,

बेरहम कुछ बम के गोले और चंद बहुत आतंकी थे,

इसी सड़क पर उनलोगों ने बहुतों को हलकान किया,

मत पूछो इस कातिल ने कितनों को लहूलुहान किया,

यह वही जगह है जहां लोग बाहर जाने को आते थे,

कुछ खट्टी-मीठी यादों को सीने में समाये जाते थे,

वह निशा बड़ी ही भयावह थी भूले से नहीं भुलाती है,

सच कहता हूँ में हे ईश्वर अब भी वो बड़ा रुलाती है,

उस मानवता के दुश्मन ने मानवता का यूँ खून किया,

कुछ यहाँ गिरे कुछ वहाँ गिरे सर्वश्व हमारा छीन लिया,

वो जिंदादिली वो भोलापन वो तेज दौड़ती जिंदगियां,

कुछ बचा नहीं बस शेष यहाँ में और मेरी सिसकियाँ,

मैं निर्बल नहीं मैं योद्धा हूँ लड़ना ही मेरा धर्म रहा,

गिर कर उठना फिर से लड़ना सदैव यही कर्त्तव्य रहा,

बस एक टीस जो सदा मुझे आठों प्रहर सताती है,

जिसने मेरा सबकुछ लुटा बन गया देश की धाती है,

क़दमों के उसकी वो आहट बैचेन मुझे कर जाती है,

ये सुनने वाले लोग मेरे वो बोझ मेरे सीने पर है,

हलक से उसके प्राण खींच लो नीति यही सिखाती है,

बोझमुक्त कर मुझे जिला दो यह मुंबई कथा सुनाती है |


Monday, April 25, 2011

उलझन...



गर्दिश में सितारे बहुतों के होंगें,

चमन में बहुत से हमारे भी होंगें,

हमारे कुछ अपने बहारों में होंगें,

बहारों के अपने नज़ारे भी होंगें,

नजारों में टूटी हवेली भी होगी,

हवेली में फैली दरारे भी होंगीं,

दरारों में फैली वो मकड़ी के जाले,

वो मकड़ी किसी के सहारे ही होगी,

सहारों की अपनी परिधि भी होगी,

परिधि में उलझी बहुत जिंदगानी,

हर इक ज़िन्दगी की कहानी तो होगी,

कहानी में सीधी कुछ टेढ़ी लकीरें,

लकीरों की बुत पर पेसानी तो होगी,

पेसानी पे छलकी पसीने की बूंदें,

पसीने में बिंदु की अपनी निशानी,

निशाने पे वैसे ज़माना भी होगा,

जमाने की होंगी वो अपनी दीवारे,

दीवारों के पीछे खड़ा सोचता हूँ,

मौजों की अपनी रवानी तो होगी|





Random thoughts...

thought1:-

किसी को प्यार करना तो कोई बात ही नहीं,

किसी का प्यार पा लेना कुछ बड़ी बात है,




किसी प्यार से वही प्यार पा लेना,क्या बात है?


उसी प्यार को अंत तक निभा देना बातें तमाम है|



thought2:-



उम्रे तमाम पढता रहा दोस्तों की मानवता एक चीज़ है,
एक एहसास सीने की,जीने का फ़लसफा,एक तहजीब है,
कसम खुदा की ढूंढा बहुत अहले शहर में इस नाचीज़ को,
लोग घूरते हैं,कसते हैं फब्तियां,कहते है बड़ा अजीब है |

Thursday, April 21, 2011

माँ भारती: हिमालय की जुबानी...

माँ भारती: हिमालय की जुबानी...: "लाल खून से सना हिमालय फिर इतिहास बताता है, छोटी आँखों के पीछे फैला षड़यंत्र आज सुनाता है, हिंदी-चीनी भाई-भाई,फिर शुरू वहाँ संग्राम हुआ, तुम..."

माँ भारती: हिमालय की जुबानी...

माँ भारती: हिमालय की जुबानी...: "लाल खून से सना हिमालय फिर इतिहास बताता है, छोटी आँखों के पीछे फैला षड़यंत्र आज सुनाता है, हिंदी-चीनी भाई-भाई,फिर शुरू वहाँ संग्राम हुआ, तुम..."

हिमालय की जुबानी...

लाल खून से सना हिमालय फिर इतिहास बताता है,
छोटी आँखों के पीछे फैला षड़यंत्र आज सुनाता है,
हिंदी-चीनी भाई-भाई,फिर शुरू वहाँ संग्राम हुआ,
तुम ही बताओ मुल्क का मेरे कैसा वो अंजाम हुआ,
फिजा में फिर से वही हवाएं बहने चारों और लगी,
खबरदार में करता हूँ की चिता हमारी सजने लगी |
मेरी छाती से अब तक वह लहू न धुलने पाया है,
वो गहरा ज़ख्म मेरा अब तलक न भरने पाया है,
वो इतिहास जो गर कभी फिर दुहराया जायेगा,
कसम मुझे की एक भी कोई यूँ न जिंदा जायेगा,
कहर बना हिमराज ये उनपर ऐसे जोर से टूटेगा,
छोटी आँखों का वारिस इस धरा में न कोई छूटेगा |
  

Wednesday, March 23, 2011

ऐसा क्यों होता है...


ज़िन्दगी की धुप में जब पाँव जलने लगते हैं,
अंतर आग में जब हम झुलसने लगते हैं,
हर तरफ विरानगी तन्हायाँ ही दिखती हैं,
करवटों में रात दिन सिसकियों में सोता है,
एक ही आवाज़ आती "ऐसा क्यों होता है"|


जब अपने लोग बेगानों में दिखने लगते हैं,
रिश्तेदारों की गली अनचाहा रस्ता लगता है,
दोस्तों का फ़ोन भी नश्तर सरीखा लगता है,
अँधेरे कोनों में दिन यूँ ही निकलने लगता है,
एक ही आवाज़ आती "ऐसा क्यों होता है"|


मंदिरों और मस्जिदों में शौक़ से न जाते थे,
नाश्तिक बन कर बड़े गर्व से इठलाते थे,
आज ऐसा क्या हुआ मंदिर नज़र आने लगा,
मंदिरों की सीढियों में अब भी दिल यूँ रोता है,
एक ही आवाज़ आती "ऐसा क्यों होता है"|


वक़्त गुजरा,हम भी संभले,नींद भी आने लगी,
दोस्तों के फ़ोन पर यूँ प्यार भी आने लगा,
चिलचिलाती जेठ में अब छाँव ही बस दिखता है,
आज भी पर भोर में तकिया क्यों गीला होता है,
एक ही आवाज़ आती "ऐसा क्यों होता है"|

Friday, March 18, 2011

होलिया में उड़े रे गुलाल ...


रे होलिया रे होलिया होली है....
गाँव का सारा लोग लुगाई लगा दू प्रेम का गुलाल
भंग भंग भंग पिलो पचा के चंग (2)

रे होलिया मैं उड़ा रे गुलाल
कइयो रे  मंगेतर से
होलिया मैं उड़े रे गुलाल
कइयो रे मंगेतर से
म्हारी ये मंगेतर चुडला वाली  (2)
घड़िया वालो रे नवाब कइयो रे मंगेतर से (2)

होलिया मैं उड़े रे गुलाल
कइयो रे मंगेतर से (2)
म्हारी ये मंगेतर नथनी वाली (2)
रे भूचा वालो रे नवाब कइयो रे मंगेतर से (2)

होलिया मैं उड़े रे गुलाल
कइयो रे मंगेतर से
म्हारी ये मंगेतर पायल वाली (2)
रे धोत्या वालो रे नवाब कइयो रे मंगेतर से (2)

होलिया मैं उड़े रे गुलाल
कइयो रे मंगेतर से
म्हारी ये मंगेतर नखरे वाली (2)
पीछे भागे रे नवाब कइयो रे मंगेतर से (2)
होलिया मैं उड़े रे गुलाल
कइयो रे मंगेतर से (8)