
अंतर आग में जब हम झुलसने लगते हैं,
हर तरफ विरानगी तन्हायाँ ही दिखती हैं,
करवटों में रात दिन सिसकियों में सोता है,
एक ही आवाज़ आती "ऐसा क्यों होता है"|
जब अपने लोग बेगानों में दिखने लगते हैं,
रिश्तेदारों की गली अनचाहा रस्ता लगता है,
दोस्तों का फ़ोन भी नश्तर सरीखा लगता है,
अँधेरे कोनों में दिन यूँ ही निकलने लगता है,
एक ही आवाज़ आती "ऐसा क्यों होता है"|
मंदिरों और मस्जिदों में शौक़ से न जाते थे,
नाश्तिक बन कर बड़े गर्व से इठलाते थे,
आज ऐसा क्या हुआ मंदिर नज़र आने लगा,
मंदिरों की सीढियों में अब भी दिल यूँ रोता है,
एक ही आवाज़ आती "ऐसा क्यों होता है"|
वक़्त गुजरा,हम भी संभले,नींद भी आने लगी,
दोस्तों के फ़ोन पर यूँ प्यार भी आने लगा,
चिलचिलाती जेठ में अब छाँव ही बस दिखता है,
आज भी पर भोर में तकिया क्यों गीला होता है,
एक ही आवाज़ आती "ऐसा क्यों होता है"|